मात्र 10 रुपए में मजदूरों को खिला रही हैं भरपेट स्वादिष्ट खाना

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Newz Quick, New Delhi आसमान छू रही महंगाई के इस दौर में भी मात्र 10 रुपये में कढ़ी-चावल, दाल-चावल, राजमा-छोले चावल व पेट भर चपातियां परोसी जा रही हैं।

श्रमिकों व क्षेत्र के अन्य लोगों को यह रसोई काफी रास आ रही है। हर दिन 200-250 लोग खाना खाने के लिए पहुंच रहे हैं। कईयों ने तो घर से खाना लेकर आना भी छोड़ दिया। क्योंकि इस रसोई में तैयार खाना कम लजीज नहीं है। 

समूह से जुड़ी हैं 10 महिलाएं :

दरअसल, ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी ये महिलाएं क्षेत्र के जठलाना की रहने वाली हैं। 10 महिलाओं ने मिलकर गीता स्वयं सहायता समूह बनाया। इनमें रीतु, सुषमा, कमला, संतोष, सलोनी, नीलम, सुनीता, अंगुरी, शिमला व पिकी शामिल हैं। पहले इन महिलाओं का समूह डेकोरेटिव सामान, अचार, मुरब्बा सहित अन्य उत्पाद तैयार करता था।

हालांकि इनकी मार्केट में इन उत्पादों की अच्छी डिमांड रही है। बाद में प्रशासन की ओर से इनको अंत्योदय आहार योजना के तहत औद्योगिक क्षेत्र में कैंटीन चलाने का आफर मिला। इन महिलाओं का कहना है कि इस कार्य से जुड़कर उनको सेवा का मौका भी मिल रहा है और घर का गुजारा भी अच्छा हो रहा है। 

खुद खरीदती हैं सामान :

कैंटीन में कामकाज संभाल रही रीतु ने बताया कि वह सुबह आठ बजे पहुंच जाती है। उसके बाद खाने की तैयारी करते हैं। अलग-अलग सब्जी के लिए अलग-अलग दिन निर्धारित है। किसी दिन राजमा चावल बनता है तो किसी दिन दाल व सूखी सब्जी।

स्वच्छता व शुद्धता का विशेष रूप से ख्याल रखा जाता है। यही कारण है कि यहां खाना खाने वालों की संख्या में दिनोंदिन बढ़ोतरी हो रही है। महिलाएं स्वयं ही मार्केट से कच्चा राशन व मंडी से सब्जी खरीदती हैं। 12 बजे दोपहर का खाना शुरू हो जाता है और तीन बजे तक चलता है। साढे चार बजे बर्तन वगैरह साफ करके निपट जाती हैं। 

खाने में घर जैसा स्वाद :

औद्योगिक क्षेत्र होने के कारण यहां काम करने वालों की संख्या काफी अधिक है। श्रमिकों के साथ- साथ अन्य कामकाज से जुड़े लोग भी यहां नियमित रूप से खाना खाने के लिए पहुंच रहे हैं। प्लाइवुड फैक्ट्री में काम करने वाले रमेश व धनिक लाल ने बताया कि उनको 15 दिन पहले इस कैंटीन के बारे में पता चला था।

उस दिन से आज तक हर दिन यहीं खाना खा रहे हैं। मात्र 10 रुपये भरपेट घर जैसा खाना खा रहे हैं। खाने में स्वाद भी है और पूरी तरह शुद्ध है। पहले वह घर से खाना लेकर आते थे, लेकिन अब यहीं खाना खा रहे हैं। बेहतरी से चला रही हैं कैंटीन :

महिलाएं अब चहारदीवारी तक ही सीमित नहीं रही हैं। प्रशासनिक कार्यों में भी भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं। औद्योगिक क्षेत्र में महिलाएं बेहतरी से कैंटीन चला रही हैं। मात्र 10 रुपये घर जैसा खाना उपलब्ध करवाया जा रहा है। इससे मानवता की सेवा का मौका भी मिल रहा है और आमदन का जरिया भी है।

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